"धरती की पुकार"

इस धरती पर जो तुमने जन्म लिया है
बदले में,
अब तक तुमने धरती को क्या दिया है?
क्या तुमने अपने जीवन का आवंटित कर्तव्य
समाप्त कर लिया है?
या फिर तुमने स्वार्थ की चरम सीमा को
लांघ दिया है?
भूलो मत!
अमृतमय अन्न खाकर, जल पीकर तुम बड़े हुए हो,
धरती की कमाई का फल खाकर ही अड़े हुए हो,
तुम बड़ी काया लेकर निर्भय बने हो,
और इस मिट्टी से ही उपजे रूई-वस्त्र से
तुमने अपना तन ढंका है,
क्या धरती के प्रति तुम्हारा कोई
कर्त्तव्य नहीं बनता है!
अगर हां, तो उठो
कर्ममय बनो, कृतज्ञ बनो,
अमित बुद्धि-शक्ति को विकसित करो,
कर्मवादी और कर्मशील बनो।
आज और अभी निष्क्रियता के दुष्ट का
संहार करो!
माता तुल्य धरती का ऋण अदा करो,
लोगों को,
कर्तव्य-कर्म के प्रति आगाह करो।

-  'शुभम शौर्य'

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