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New Year Message

ऐ जिंदगी मुझे संभाल! एक और साल फिसल गया दिन गिनती में निकल गया लेकिन सृष्टि का समस्त कार्य अपने निश्चित समय पर हुआ फूल वक्त पर खिला, तो फल वक्त पर पका सूर्य वक्त पर उगा, तो चांद वक्त पर ढला नियमपूर्वक, दिन हुई फिर रात हुई मौसम गर्म हुआ फिर सर्द हुई धरती ने भी, ईमानदारीपूर्वक सूर्य की परिक्रमा करी मंजिलें पाकर, वीरों ने भी चैन की आहें भरी इस साल, सबने विजय का नगाड़ा बजाया लेकिन मैं जहां था, वहीं रह गया साल दर साल, एक और साल फिसल जाएगा दिन गिनती में निकल जाएगा अब तू ही कोई उपाय निकाल ऐ जिंदगी मुझे संभाल! ऐ जिंदगी मुझे संभाल! 'Shubham Saurya'

अध्यापक और गुरु में क्या फर्क होता है?

अध्यापक और गुरु में फर्क? हिंदी भाषा इसलिए भी अनूठी है क्योंकि इसके कुछ शब्द एक जैसे प्रतीत होते हैं पर उनके असली अर्थ में कुछ बारिक फर्क होता है। जैसे गुरु और अध्यापक, इनमें फर्क यह है कि अध्यापक सिर्फ अध्ययन कराने से जुड़ा है जबकि गुरु अध्ययन से आगे जाकर जिंदगी की हकीकत से भी रूबरू कराता है और उससे निपटने के गुर सिखाता है। एक अध्यापक आपको आसानी से मिल सकते हैं किंतु एक गुरु को आपको ढूंढना व अर्जित करना पड़ता है। इसको इस प्रकार से समझिए :- मान लीजिए एक व्यक्ति किसी कारणवश एक घर की बंद चारदीवारी में फंसा है और बाहर से ताला लगा है। सर्वप्रथम उसने अपनी सहायता के लिए अपने शिक्षक को बुलाया, उसके शिक्षक उसके पास खाने योग्य कुछ सामान और कुछ पुस्तकें लेकर पहुंचे और उन्होंने उस व्यक्ति को राय दी कि खाली वक्त में तुम यह पुस्तकें पढ़ना इससे तुम्हारा मन लगा रहेगा और भूख लगे तो यह खाना खा लेना। "यानी कि उसके शिक्षक ने उसको उस स्थिति में ढलना सिखाया।" दूसरी दफा उसने अपनी सहायता के लिए अपने गुरु को पुकारा, तो उसके गुरु उसके पास घर की दूसरी चाबी लेकर पहुंचे और ताला खोलकर अपने शिष्य...

संगीत क्या है?

संगीत क्या है? पायलों की छनछन से चूड़ियों की खनखन तक भंवरों की भनभन से बसा है कण-कण तक आ महसूस तो कर हवाओं में संगीत है घटाओं में संगीत है लेहरो में संगीत है जो बहरो को सुनाई दे पानी के ठहराव में संगीत है मदहोशी में संगीत है बेहोशी में संगीत है वीणा, ढोल-मंजीरा, तबला माध्यम मात्र है आ सुन तो सही मेरी ख़ामोशी में संगीत है सावन की बूंदों में संगीत है गहरी नींदों में संगीत है कुल मिलाकर कहूं हर बिंदु में संगीत है तुम में संगीत है 'शुभम' में संगीत है गीत, वाद्य, नृत्य का संगम ही संगीत है आह से वाह तक का माध्यम ही संगीता है।

ऐ कलम!

ऐ कलम! चल उठ और लिख ऐसी रचना जो ललकारे पुरुषत्व को जो दर्शाए नारी शक्ति को वह भारत जिसे नारी शक्ति के भक्ति से जाना जाता था, नारी का मान सम्मान माना जाता था स्वयं से पूछो क्या वह भारत आज भी जिंदा है? अरे! नासमझी तो हमारी है भारत माता तू क्यों शर्मिंदा है? ऐ कलम! चल उठ और लिख ऐसी कविता जो ललकारे अमानवीयता को जो दर्शाए नैतिक मूल्यों को वह भारत जिसे मानव की मानवता से जाना जाता था, संस्कार का भंडार माना जाता था स्वयं से पूछो क्या वह भारत आज भी जिंदा है? अरे! नासमझी तो हमारी है भारत माता तू क्यों शर्मिंदा है?

"धरती की पुकार"

इस धरती पर जो तुमने जन्म लिया है बदले में, अब तक तुमने धरती को क्या दिया है? क्या तुमने अपने जीवन का आवंटित कर्तव्य समाप्त कर लिया है? या फिर तुमने स्वार्थ की चरम सीमा को लांघ दिया है? भूलो मत! अमृतमय अन्न खाकर, जल पीकर तुम बड़े हुए हो, धरती की कमाई का फल खाकर ही अड़े हुए हो, तुम बड़ी काया लेकर निर्भय बने हो, और इस मिट्टी से ही उपजे रूई-वस्त्र से तुमने अपना तन ढंका है, क्या धरती के प्रति तुम्हारा कोई कर्त्तव्य नहीं बनता है! अगर हां, तो उठो कर्ममय बनो, कृतज्ञ बनो, अमित बुद्धि-शक्ति को विकसित करो, कर्मवादी और कर्मशील बनो। आज और अभी निष्क्रियता के दुष्ट का संहार करो! माता तुल्य धरती का ऋण अदा करो, लोगों को, कर्तव्य-कर्म के प्रति आगाह करो। -  'शुभम शौर्य'